असफल हो जाने पर क्या करें?

प्रतियोगी परीक्षा में डटे रहने पर ही मिलती है जीत

 प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी बहुत साहस का काम है. कई बार यह होता है कि किसी प्रतियोगी के एक ही बार में, परीक्षा के तीनों पड़ाव पार हो जाते हैं, तो कई बार यह भी होता है कि छात्र परीक्षा देते-देते एक या दो बार असफल हो जाते हैं. यह बड़ी कठिन स्थिति है. आपकी तैयारी अच्छी थी लेकिन कुछ प्रश्न ऐसे आ गए जो आप पढ़ नहीं पाए, कुछ प्रश्नों में दुविधा की स्थिति थी और कुछ एकदम सरल थे, जो सभी ने कर दिए होंगे. अब इस प्रकार आप असफलता का बोझ लिए बैठ गए. और फिर आपका आत्मविश्वास डगमगा जाता है और आप किसी दूसरे विकल्प के बारे में सोचने लगते हैं.

वास्तव में प्रतियोगी परीक्षा एक जुए की तरह ही है. कई बार अच्छे-अच्छे ज्ञानी धरे रह जाते हैं और सामान्य सा व्यक्ति बाजी मार ले जाता है. लेकिन ज्ञानी किस वजह से रह गए, इस बात का विश्लेष्ण करना बहुत जरुरी है. तो सबसे पहली बात तो यह है कि आत्मविश्वास को डगमगाने न दें. यदि डगमगा रहा है तो सँभालने का प्रयास करें. हताश न हों.

दूसरी बात है कि असफलता का दोष अपने अलावा किसी भी अन्य बिंदु पर न मढें. सच्चे तरीके से आत्मविश्लेषण करें. वास्तव में कमी कहाँ रह गयी थी. सबसे पहले प्रश्नपत्र उठाकर सब प्रश्नों का प्रतिशत देखें. किस विषय से कितने प्रश्न पूछे गए? क्या इस बार खेल से संबंधित प्रश्न अधिक पूछ लिए गए? अगर हाँ तो, मेरी खेल से संबंधित तैयारी कैसी थी? खेल के मेरे अधिकांश प्रश्न गलत हो गए. ये प्रश्न सही होते तो मेरे प्रतिशत बढ़ जाते और परीक्षा निकालने की सम्भावना बढ़ जाती.

परीक्षा का दारोमदार कठिन प्रश्नों के सही होने पर तो टिका ही होता है. साथ ही सरल प्रश्नों पर भी उतना ही होता है. सरल प्रश्नों के बारे में माना जाता है कि ये तो सबको आ ही जाएँगे. अगर उन प्रश्नों में से आपके प्रश्न गलत हो गए तो आपके चयन की सम्भावना कम हो जाती है. और कठिन प्रश्न तो पूरे सही हो ही नहीं पाते. इस तरह से आप चयनित नहीं हो पाए. ये तो हो गई विश्लेषण की बात.

मगर इसमें आप ये दोष मत दीजिए कि खेल से इतने प्रश्न क्योँ पूछे गए? प्रतियोगी परीक्षा में तो कुछ भी पूछ जा सकता है. आप अपना आकलन करिए कि मुझे कहाँ सुधार की जरुरत है. जब आपने यह कर लिया तो बहुत कुछ कर लिया.

अब इसके बाद बारी आती है, अपने आप को फिर से समेटकर तैयार करने की.विश्लेषण के बाद कमजोर बिन्दुओं पर तैयारी करने में जी जान से जुट जाइए. बीच-बीच में आपको बीती परीक्षा और उसके परिणाम की भी याद आएगी. पर उसी को अपनी प्रेरणा बनाइए. सोचिए कि अब जो हम तैयारी कर रहे हैं उसमें खेल से संबंधित कुछ न छूटने पाएगा. आपको ऐसा करना ही पड़ेगा क्योंकि एक बार इतनी तैयारी के बाद मैदान छोड़ना आपके लिए नुक्सान और दूसरों के लिए फायदे का सौदा हो सकता है. आप छोड़ देंगे तो प्रतियोगिता के रण में एक दावेदार कम हो जाएगा. और दूसरों को लाभ होगा. इसीलिए लगे रहिये.

इसमें एक बात और है. आपको प्रतियोगी परीक्षा के लिए एक विकल्प ज़रूर पास में रखना चाहिए. ताकि आप निश्चिन्त होकर तैयारी कर सकें. यदि आपके पास विकल्प नहीं है तो साथ में कोई कोर्स करें. फिर आपका प्रश्न होगा कि तैयारी का क्या होगा? इसका उत्तर यह है कि आप दो-तीन साल से तैयारी कर रहे हैं तो आपका बेस तो मजबूत हो चुका है. अब आपको दोहराव और जानकारी को अपडेट करने का काम करना है. जिसमें अधिक समय नहीं लगता है. तो आप यह कर पायेंगे.

आप साथ में कोई काम या जॉब कर सकते हैं. जैसे आप किसी प्रतियोगी संस्था से जुड़कर उनके लिए नोट्स बनाने का काम, अनुवाद का काम, बहुविकल्प प्रश्न बनाने का काम कर सकते हैं. किसी प्रतियोगिता के लिए मासिक पत्रिका के लिए काम कर सकते हैं. मतलब आप विषय से जुड़े रहकर विकल्प तलाश सकते हैं. ऐसा अधिकाँश लोग करते ही हैं.

किसी अखबार से जुड़ना भी आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. पर साथ में पढाई के साथ मेनेजमेंट भी करना आना चाहिए. ये न हो कि  वह नौकरी ही आपके जीवन का लक्ष्य बन जाए. आपको उसे एक सहायक विकल्प के रूप में देखना है. आपका अंतिम लक्ष्य तो आपको पता ही है.

तो असफलता से मत घबराइए. मैदान में सहायक अस्त्रों को लेकर डटे रहिए. जब लोग मैदान छोड़कर भाग रहे हों तो डटे रहने वाला ही विजेता कहलाता है. 

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