राजा राम मोहन राय
raja ram mohan rai
भारतीय समाज को अंधविश्वास और कुरीतियों से मुक्त करने वाली विभूति राजा राम मोहन राय का जन्म प्र बंगाल के वर्धमान जिले के राधानगर नामक ग्राम में 22 मई 1774 को हुआ था। पटना में पढाई के बाद वे ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में 14 वर्ष लगे रहे। ईसाई धर्म ग्रंथों के अध्ययन के लिए उन्होंने ग्रीक,लेटिन और हिब्रू भी सीख ली।
उनके नाम में राजा शब्द एक उपाधि था जो इंग्लैंड जाते समय मुगल सम्राट ने प्रदान किया था। भारत के समाज को बाहय आडंबर, पारस्परिक वैमनस्यता, अस्पृश्यता, गुलामी और सामाजिक व धार्मिक कुप्रथा से मुक्त करने का प्रयत्न करने वाले आप प्रथम व्यक्ति थे अत: आपको भारतीय पुर्नजागरण का जनक कहा जाता है।
उनके व्यक्तित्व में कई विशेषताएं थी और समाज सुधार के साथ साथ उन्होंने कई अन्य क्षेत्रों में देश हित में कार्य किए।
समाज सुधारक—
सती प्रथा, बालविवाह, जाति प्रथा, अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों के लिए उन्होंने भारतीय समाज में नवचेतना का संचार किया। उनके अथक प्रयासों के कारण 1829 में लार्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया। बालविवाह जैसे सामाजिक अभिशाप का विरोध करते हुए विधवा पुर्नविवाह को प्रोत्साहित किया। उंचनीच की भावना व अस्पृश्यता को उन्होंने मानवता का महान शत्रु माना। उनके शब्दों में— जाति भेद जिससे हिन्दू समाज अनेक जाति उपजाति में बंट गया है हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रहा है। एकता के अभाव में ही हम दासता की जंजीर में जकडे रहे।
धर्म सुधारक—
कई भाषाओं के जानकार होने के कारण सभी धर्मग्रंथों का अध्ययन करने में समर्थ होने के कारण वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सभी धर्म एकेश्वरवाद की ओर जाते हैं। धर्म रुपी प्रकाश स्त्रोत से दो प्रकार की किरणें फूटती हैं त्याज्य और स्वीकार्य।
हिंदू धर्म में मूर्तिपूजा एवं अंधविश्वास का विरोध किया एवं आत्मा वय ब्रहम मनुष्य देवता तुल्य है को स्वीकार किया। राजा साहब ने धार्मिक एकता को नई दिशा देने के लिए 1828 में ब्रहम समाज की स्थापना की।
राजनीतिक विचारक—
राजा साहब के विचार बैंथम के विचारों से मेल खाते थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए वरदान की तरह है भारतीय अधिक सभ्य व सुसंस्कृत हो जाए फिर बाद में आजादी हासिल कर लेंगे। ब्रिटिश शासन की विसंगतियों के विरुद्व अपनी आवाज बुलंद करते रहे। स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए वे शक्ति के पृक्करण के पक्ष में थे। वे ब्रिटिश न्याय व्यवस्था के खिलाफ थे इसमें सुधार के लिए उन्होंने कुछ शर्तें रखी थी।
1—जूरी प्रथा शुरु की जाए।
2—न्यायाधीश व मजिस्ट्रेट के पद अलग किए जाएं।
3— न्यायालय की कार्यवाही लोगों के लिए खुली हो।
4—उच्च पदों पर भारतीयों को भी आसीन किया जाए।
5— पंचायतों को फिर से जीवित किया जाए।
6— भारतीय जनमत के आधार पर कानून बनाए जाएं।
1833 में उन्होंने इंगलैंड की यात्रा की क्योंकि 1833 में कंपनी के चार्टर के नवीनीकरण की खबर सुनी थी। भारतीयों की दुर्दशा से अवगत कराने और कंपनी के दोषों को उजागर करने के लिए प्रथम भारतीय प्रतिनिधि के रुप में वे वहां गए। उनका भव्य स्वागत हुआ। आपने पेंशनर मुगल सम्राट के आवेदन पत्र को वहां प्रस्तुत किया। आप पहले भारतीय थे जिससे ब्रिटिश संसद सलाह लेती थी।
प्रेस की स्वतंत्रता के पक्षधर—
प्रेस की स्वतंत्रता को समाज सुधार के लिए जरुरी मानने वाले राजाजी ने संवाद कौमुदी व मिरातुल अखबार का संपादन किया। प्रेस पर किसी भी तरह का प्रतिबंध उन्हें स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने प्रेस की आजादी छीनने वाले एडास के प्रेस के अध्यादेश 1823 के विरोध में संवैधानिक आंदोलन चलाया। उन्हीं के प्रयासों के फलस्वरुप दो वर्ष बाद 1835 में गर्वनर जनरल चालर्स मैटकाफ को प्रेस की स्वतंत्रता को मान्यता देनी पडी।
हिंदू मुस्लिम एकता के हिमायती—
वे भारत की आजादी के लिए हिंदू मुस्लिम एकता को आवश्यक मानते थे। ब्रिटिश सरकार के उस हर कदम का विरोध करते थे जो दोनों धर्मों के लोगों में अंतर की खाई को बढाता था। इसीलिए उन्होंने 1823 के हिंदू मुस्लिम के बीच दूरी बढाने वाले जूरी एक्ट का विरोध किया। इसके विरोध में उन्होंने ब्रिटिश संसद में आवेदन भी दिया था।
अंतरर्राष्ट्रीयतावादी व मानवतावादी—
वे मानवता एवं अंतरर्राष्ट्रीयता के प्रबल सर्मथक थे। संपूर्ण मानव जाति को वे एक परिवार की तरह मानने के कारण अंतरर्राष्ट्रीय मामलों में विवादों के हल के लिए समझौतों को ही एकमात्र हल मानते थे। उनका मानना था कि प्रत्येक देश की संसद से एक एक सदस्य लेकर एक अंतरर्राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के पक्षधर थे। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ व अन्य अंतरर्राष्ट्रीय संगठनों का स्वप्न उन्होंने बहुत पहले ही देख लिया था।
सबकी भलाई के बारे में सोचने वाले इस प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निधन 1833 को इंग्लैंड के ब्रिस्टल में भारतवासियों के कल्याण का कार्य करते हुए हुआ।
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