सिंहस्थ महाकुम्भ

simhastha mahakumbh

 कुंभ मेला

कुंभ मेले में लाखो की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते है । ऐसा माना जाता है कि संगम के पवित्र जल में स्नान करने से आत्मा की शुद्धि हो जाती है । कुम्भ और अर्धकुम्भ के दौरान नदी के किनारे विशाल शिविर लगाये जाते हैं । कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक- में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष इस पर्व का आयोजन होता है। देश विदेश के साधु सन्यासी एकत्र होते हैं। विभिन्न प्रकार के अखाडे अपना अपना शिविर लगाते हैं। अन्न क्षेत्र चलाए जाते हैं। स्नान व शाही स्नान की तिथियां तय होती हैं इन तिथियों पर स्नान करने का विशेष महत्व है। 

सिंहस्थ कुम्भ
उज्जैन में मेष राशि में सूर्य और सिंह राशि में गुरु के आने पर यहाँ महाकुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है, उज्जैन में जिसे सिंहस्थ कुम्भ महापर्व के नाम से देशभर में जाना जाता है। सिंहस्थ कुम्भ महापर्व के अवसर पर उज्जैन का धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व स्वयं ही कई गुना बढ़ जाता है। पवित्र क्षिप्रा नदी में पुण्य स्नान की विधियाँ चैत्र मास की पूर्णिमा से प्रारम्भ होती हैं और वैशाख माह की पूर्णिमा तक यह चलता है।
सन 2016 का सिंहस्थ 22 अप्र्रैल से 21 मई उज्जैन
पौराणिक कथा
कुंभ पर्व के आयोजन के बारे में मुख्य कथा इस प्रकार है— जिसके  अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर पड गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवताओं ने मिलकर भगवान विष्णु के पास  जाकर उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के कहने पर सभी देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने में लग गए। समुद्र मंथन के बाद 14  रत्न प्राप्त हुए। 14 वां व अंतिम रत्न अमृत कुंभ था जिसके निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र जयंत अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।

इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया।

अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है।

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