श्री गणेश शंकर विद्यार्थी

 
श्री गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को प्रयागराज इलाहबाद की भूमि पर अपने ननिहाल में हुआ था। पिता श्री जयनारायण एक सुशिक्षित, उत्तम विचारों से ओत प्रोत,राष्ट्रभक्त एवं परोपकारी व्यक्ति थे। नाना सूरज प्रसाद सहायक जेलर थे। जेल में बनी डबलरोटियों का स्वाद गणेश ननिहाल में लिया करते थे। क्या पता था कि बालक गणेश अभी से जेल में बनी रोटियों खाने का अभ्यास कर रहा है। 

4 वर्ष की उम्र में अपने पिता के पास रहकर पढते हुए गणेश को उर्दू का अच्छा ज्ञान हो चला था लेकिन ज्यादा मजा हिन्दी पढने में आता था। आगे चलकर उन्होंने स्वयं लिखा— मुझे हिन्दी बडी सरल लगती थी। हिन्दी पढने में मेरा मन भी अधिक लगता था। मैंने उन्हीं दिनों हिन्दी के अखबारों को पढकर बहुत सी सामाजिक और राजनीतिक बातों का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

समय के साथ 1907 में गणेश ने द्वितीय श्रेणी में हाईस्कूल उत्तीर्ण कर लिया और फिर शारिरिक अक्षमता के कारण एफ ए की पढाई बीच में ही छोड दी। खाला बैठना भाता न था इसलिए पीपीएन स्कूल में बीस रुपए प्रति माह पर अध्यापन कार्य प्रारंभ कर दिया। उन्हीं दिनों पं सुंदरलाल का एक अखबार कर्मवीर निकलता था जिसमें गोरी सरकार के विरुद्ध आलोचनाएं छपती थीं। एक बार स्कूल के प्रधान ने गणेश को अखबार पढते देख लिया और गरजे— इस अखबार को जला दो। पर गणेश ने अपने प्रिय अखबार के बारे में ऐसा कदम न उठाते हुए नौकरी से तुरंत त्यागपत्र दे दिया। 

1909 तक गणेश अच्छे लेखक बन चुके थे। उनके लेख कर्मवीर, स्वराज और अभ्युदय में छपने लगे। अपनी लेखनी के दम पर गणेश अपने समय की श्रेष्ठ मासिक पत्रिका सरस्वती में कार्य कर रहे थे जिसके प्रधान संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। उन्हीं दिनों अभ्युदय में सहायक संपादक की जगह खाली हुई जिसके संस्थापक एवं संपादक मदनमोहन मालवीय थे।

एक बार गणेश ने अपना साप्ताहिक पत्र निकालना चाहा जिसके लिए धन की व्यवस्था अग्रणी सामाजिक कार्यकर्ता काशीप्रसाद ने की थी। इसका नाम रखा गया प्रताप। वही प्रताप जिसने भारतीय जन मानस में राष्ट्र की आजादी हेतु कृतसंकल्प रहकर लडने, गोरी सरकार के काले कारनामों का जनता के समक्ष प्रकट करने और जनता के भीतर स्वतंत्रता का भाव जगाने में अमूल्य सहयोग दिया।  

13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड को प्रताप ने बडी निर्भीकता से ऐसे छापा जैसे किसी भी अन्य पत्र ने नहीं छापा था। चीखते पुकारते घायल लोगों के और मृतको के चित्र भी छापे गए। कई मर्मस्पर्शी लेख व टिप्पणी भी लिखी गई। 
गणेश शंकर विद्यार्थी प्रताप के माध्यम से जनता के बीच थे। असहयोग आंदोलन में प्रताप की भूमिका सदैव स्मरण की जाएंगी। इसी दौरान गणेश की भेंट जवाहर लाल नेहरु, महात्मा गांधी एवं भगत सिंह से हुई। भगत सिंह ने लंबे समय तक प्रताप में काम किया।

1931 में भगतसिंह व उनके साथियों को असेम्बली बम विस्फोट के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई। 23 मार्च को फांसी दे दी गई। पूरे देश में शोक का समुद्र उमड पडा। कई जगह दंगे हुए दंगों ने सांप्रदायिक रुप ले लिया। गणेश अपने साथियों सहित लोगों को बचाने निकल पडे। कई लोगों को उन्होंने इस दानवता का शिकार होने से बचाया। जिसमें हिंदू व मुसलमान दोनों थे। 
25 मार्च को वे अपने चार स्वयंसेवकों जिनमें से दो हिंदू थे और दो मुसलमान,के साथ फिर कानपुर की गलियों में निकल पडे। सहसा मुसलमानों का एक समूह निकल आया जो लाठी बल्लम से लैस थे। साथ के मुसलमान स्वयंसेवक गरज पडे— खबरदार ये वही गणेश शंकर हैं जिन्होंने हजारों मुसलमान स्त्रियों व बच्चों की जान बचाई है। इनकी जान लेना दोजख में जाने के बराबर है। भीड के समझदार मुसलमान पानी—पानी हो गए। गणेश शंकर से क्षमा मांगने लगे। गणेश ने कहा— तुम लोग भले ही हमें मार डालो पर हम तुम्हें तभी क्षमा करेंगे जब तक तुम एकता की शपथ नहीं लेते और मिलजुलकर रहने की कसम नहीं खा लेते। भीड मौन हो गई। गणेश उन्हें छोडकर आगे बढे। एक गली में गए ही थे कि बल्लम लाठियों से लैस भीड ने उनपर वार कर दिया। जंगली भेडियों की तरह उनपर टूट कर उन्हें धरती की गोद में सुला दिया। धरती रक्त से लाल हो गई। 

गणेश शंकर की हत्या का समग्र भारत में विरोध हुआ। जवाहर लाल नेहरु, महात्मा गांधी, मदनमोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, मैथिलीशरण गुप्त व आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी आदि कई नेताओं ने उनकी हत्या को अमानवीय और निंदनीय कृत्य बताया। 

अभ्युदय में छपा था— गणेश शंकर की हत्या जिन लोगों ने की है उन्हें हम वहशी और दानव के अतिरिक्त कुछ नहीं कहेंगे। गणेशजी तो अमर हो गए पर हत्या करने वालों को दोजख में भी स्थान नहीं मिलेगा। देखना यह है कि जिस मुहल्ले के पास उनकी हत्या हुई उस मुहल्ले के कितने लोगों को सरकार फांसी के तख्ते पर चढाती है।  

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