फ्रांसीसी क्रांति
french revolution
फ्रांसीसी क्रांति-
1789 ए डी में फ्रांस के समाज में वर्षों से चल रही व्यवस्था के खिलाफ लोगों के मन में चल रही उथल पुथल एक क्रांति के रुप में फूट पडी जिसका असर केवल फ्रांस पर ही नही बल्कि अन्य देशों की व्यवस्था पर भी पडा। मानव अधिकार एवं अन्य अधिकारों के प्रति जागरुकता जगाने में भी फ्रांसीसी क्रांति ही मुख्य कारक रही। कुछ परिस्थितिजन्य कारण निम्नानुसार हैं-
सामाजिक कारण-
क्रांति के पूर्व फ्रांस के समाज में कई विषमताएं थी। उच्च वर्ग को कई अधिकार प्राप्त थे जबकि मध्यम व निम्न वर्ग का जीवन कठिनता से बसर हो पाता था। निम्न वर्ग में किसान एवं मजदूर राज्य द्वारा लगाए गए कर की मार से एवं बेगारी से त्रस्त था। वहीं मध्यम वर्ग में वकील, चिकित्सक, शिक्षक सभी उच्च वर्ग के अपमान का शिकार बने हुए थे। यही सामाजिक असमानता क्रांति का मुख्य कारण सिद्व हुई।
राजनैतिक कारण-
फ्रांस के सम्राट लुई चैदहवें एक कमजोर शासक थे। सम्राट एवं उनकी पत्नी का जीवन अत्यंत विलासितापूर्ण था। तरह तरह के उत्सवों में शासन का खजाना खाली हो रहा था। चाटुकारिता के बल पर उच्च पदों पर आसीन अधिकारी प्रशासन का मनमाने ढंग से चला रहे थे। समस्त प्रशासन भ्रष्टाचार से ओत प्रोत था व प्रत्येक विभाग का अपना अलग कानून था। इस प्रकार असमान व्यवस्थाओं के काम करने से आम जनता में भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। सडी गली व्यवस्थाओं से जनता त्रस्त हो चुकी थी और परिवर्तन चाहती थी। र्
आर्थिक कारण-
यही दौर था जब फ्रांस लगातार युद्वों में भाग ले रहा था जिससे उसकी अर्थव्यव्यस्था बुरी तरह चरमरा गई थी। सम्राट लुई चैदहवें एवं उनकी पत्नी के विलासितापूर्ण रहन सहन में कोई कमी नही की गई बल्कि आम जनता से कर के रुप में ज्यादा पैसा खींचा गया। कर की दरें बढा दी गईं। व्यवस्थाएं ठीक तरह से लागू नहीं की गई कमजोर वर्ग जो कर देने की स्थिति में नहीं था उन पर दुगुनी मात्रा में कर लगा दिए गए जबकि उच्च वर्ग जो कर चुकाने की स्थिति में थे उनका कर माफ कर दिया गया। अर्थव्यवस्था की स्थिति खराब हो गई व फ्रांस का शासन दिवालिएपन की कगाार पर पहुंच गया। चरमराई अर्थव्यवस्था भी क्रांति का एक मुख्य कारण साबित हुआ।
अन्य कारण-
अर्थव्यवस्था की दिवालिएपन स्थिति को लेकर सम्राट लुई चैदहवें ने 1789 ए डी में इस्टेट जनरल्स की सभा बुलाई। यह सभा 175 वर्षो के बाद हो रही थी इसलिए सभी अपनी समस्याएं रखने के लिए उत्साहित थे। किंतु कुछ समूहों ने इसमें भाग लेने से इंकार कर दिया। और सभा बुलाने का कार्यक्रम निरस्त कर दिया गया। इस बात को लेकर लोगों में असंतोष भडक उठा।
1788 से लेकर 1789 तक अकाल पडा था जिसकी विभीषिका से लोग उबर नहीं पाए थे।
प्रश्न-क्रांति से फ्रांस के समाज के किन समूहों को लाभ पहुंचा।
क्रांति से फ्रांस के समाज के उन सभी समूहों को लाभ पहुंचा जो थर्ड इस्टेट से संबंधित थे। जैसे किसान, मजदूर वर्ग, छोटे अधिकारी वर्ग, शिक्षक, चिकित्सक एवं छोटे व्यापारी आदि। पूर्व में इस वर्ग को कई तरह के कर चुकाने पडते थे और साथ ही साथ उच्च वर्ग के अपमान का शिकार भी होना पडता था। किंतु क्रांति के पश्चाात यह वर्ग समाज के उच्च वर्ग के समान ही हो गया और समानता का व्यवहार प्राप्त करने लगा।
क्रांति के पश्चात उच्च वर्ग के अधिकार एवं शक्तियां समाप्त हो गईं। इस वर्ग को मिले विशेषाधिकार समाप्ति के साथ ही समाज में समानता व्याप्त हो गई।
फ्रांस की क्रांति से 19 वीं एवं 20 वीं सदी के लोगों को विरासत में क्या मिला-
फ्रांस की क्रांति का विश्व के इतिहास में बहुत महती योगदान रहा है। इसने विश्व को स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे जैसे तीन मुख्य आदर्श प्रदान किए। आधुनिक युग पर इस क्रांति के मुख्य प्रभाव इस प्रकार हैं-
फ्रांस की क्रांति ने मनमाने शासन का खात्मा किया और यूरोप तथा विश्व के अन्य देशों में लोकतंत्र का रास्ता दिखाया। इसने विश्व के समस्त लोगों को स्वतंत्रता के आदर्शों की ओर प्रेरित किया जो आगे चलकर राष्ट्रीय सम्प्रभुता का आधार बना। फ्रांसीसी क्रांति ने सभी नागरिकों को समान अधिकारों के सिद्वांतों की आधारशिला रखी जिसने धीरे धीरे सभी नागरिकों के मध्य समानता के आधार को प्रतिपादित किया।
इसने भाईचारे के सिद्वांतों को प्रचारित किया जिससे समाज के सभी वर्गों के बीच प्रेम, एकता और सहयोग की भावना को बढावा दिया। देखा जाए तो फ्रांसीसी क्रांति के द्वारा विश्व को सही मायनों में राष्ट्र जैसे शब्द के अर्थ से परिचित कराया एवं राष्ट्रवाद की भावना को प्रेरित किया। पोलैंड, जर्मनी, इटली व नीदरलैंड जैसे देशों में राष्ट्रवादी राज्यों की स्थापना को प्रेरित किया। फ्रांसीसी क्रांति के द्वारा राजशाही शासन चला रहे देशों को भी जनता के हितों के लिए व्यवस्था में सुधार को प्रेरित किया।
लोकतंत्रात्मक अधिकारों की जननी फ्रांसीसी क्रांति-
हम भारत में कुछ मूल अधिकारों का उपभोग कर रहे हैं जो फ्रांसीसी क्रांति से उदभूत हुए है।
समानता का अधिकार
स्वतंत्रता का अधिकार
संस्कृति का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
शोषण के विरुद्व अधिकार
संवैधानिक उपचारों का अधिकार
यदि हम फ्रांसीसी क्रांति का सूक्ष्म अध्ययन करें तो आसानी से यह पाएंगें कि इन सभी अधिकारों का आधार यहीं से प्रेरित है।
समानता का अधिकार फ्रांसीसी क्रांति का मुख्य आधार था। जिसने विशेष वर्ग के विशेष अधिकार के विरुद्व जाकर सभी वर्गों को समान अधिकार प्रदान करने की बात की।
इसी प्रकार स्वतंत्रता के अधिकार के उदभव के पीछे भी क्रांति ही एक कारक रही। मनुष्य के अधिकारों के घोषणापत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता व आम जनता के अधिकारों की बात कही गई है।
फ्रांस की क्रांति, लोकतंत्र की आत्मिक प्रेरणा है जो मनुष्य के सभी अधिकारों को सुनिश्चित कराती है। यह इस सिद्वांत पर जोर देती है कि शासन को न सिर्फ जनता के लिए होना चाहिए बल्कि जनता के द्वारा भी होना चाहिए।
वर्ग भेद की दीवारों को तोडते हुए भाईचारे की भावना का विकास एवं सामाजिक कल्याण को बढावा देने का संदेश भी फ्रांसीसी क्रांति की बडी देन माना जाता है। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि फ्रांसीसी क्रांति परोक्ष या अपरोक्ष रुप से सभी मानवीय आधारभूत सिद्धांतों की जननी है।
फ्रांस के इतिहास में नेपोलियन की भूमिका
फ्रांस के सम्राट नेपोलियन का जन्म 1769 ए डी में कोर्सिका की राजधानी अजाकियो में हुआ। जिसने फ्रांसीसी क्रांति के कई सुधारों को एकीकृत करके संस्थागत रुप प्रदान किया था। एक महान सेनाध्यक्ष की भूमिका निर्वाह करते हुए उसने यूरोप के बडे हिस्से को जीता और अपने शासित देशों के आधुनिकीकरण का कार्य किया।
नेपोलियन चमत्कारी प्रतिभा का धनी था। उसकी शिक्षा ब्रियन व पेरिस के सैनिक स्कूलों में हुई थीं। वह आर्मी में भर्ती हुआ और अपने असीम साहस और क्षमताओं के कारण 1796 में इटली में फ्रेंच आर्मी कमांडर नियुक्त हुआ। 1796 में उसने जोसेफिन डे बेहरनिस से विवाह किया जो गिलोटिन की भेंट चढाए गए एक शहीद की विधवा एवं दो बच्चों की मां थी।
नेपोलियन ने कई युद्ध जीते और फ्रांस का मान बढाया। उसने 1793 एडी में ब्रिटेन को, 1796 एडी मे सरदीनिया को हराया। उसने क्रम से चार आस्ट्रियन जनरल्स को हराया और आस्ट्रिया और उसके सहयोगियों को शांति कायम करने के लिए प्रेरित किया।
नेपोलियन एक स्वप्रेरित व्यक्तित्व था जिसने फ्रांस, यूरोप एवं विश्व के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। नेपालियन कर्मठ व्यक्तित्व का धनी था उसके जीवन काल में मनोरंजन और छुटिटयों के लिए बहुत कम स्थान था। अपने परिवार और सहयोगियों के प्रति अत्यधिक समर्पित था। वह अच्छा वक्ता और लेखक भी था। नेपोलियन जनमत के अनुसार कार्य करने वाला एक कुशल प्रशासक भी था। धार्मिक सहिष्ण्ुाता की नीति पर चलते हुए उसने अपनी जनता को धार्मिक स्वतंत्रता दी थी। उसने फ्रांस में वर्गरहित समाज की स्थापना की और समानता के सिद्धांत के अनुसार काम किया। एक समय में नेपोलियन का नाम यूरोपियन राजशाही देशों के लिए भय का पर्याय बन गया था। लेकिन यूरोपियन राष्ट्रों के चैथे गठबंधन के आगे उसकी सेना कमजोर पड गई। 1815 एडी में वाटरलू के युद्ध में उसे हार का सामना करना पडा। अपने अंतिम दिन उसे सेंट हेलेना द्वीप में एक कैदी के रुप में गुजारने पडे एवं 1821 एडी में उसकी मृत्यु हो गई।
लुई चौदहवें
लुई चौदहवें ने 1774 में 20 वर्ष की उम्र में सत्ता संभाली। लुई चौदहवें ने ब्रिटेन से 13 अमेरिकन उपनिवेशों की स्वतंत्रता के लिए युद्ध किया। लंबे समय से युद्ध के कारण फ्रांस का खजाना खाली हो गया था। फ्रांस ने अत्यधिक ऋण लिया जिसका ब्याज 10 प्रतिशत था। इन सभी खर्चों को पूरा करने, विलासिता व्यय, सेना के व्यय, न्यायालय व्यय, शासकीय अधिकारियों के वेतन व्यय एवं महाविद्यालयों के व्यय को पूरा करने के लिए उसने जनता पर करों का बोझ बढा दिया।
फ्रांस का समाज तीन भागों में बंटा था- पादरी, कुलीन वर्ग एवं सामान्य जनता। जिन्हे क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय इस्टेट कहा जाता था। पादरी, कुलीन वर्ग जनसंख्या का 10 प्रतिशत थे लेकिन 60 प्रतिशत भूमि पर उनका अधिकार था। तृतीय इस्टेट या सामान्य जनता का प्रतिशत 90 प्रतिशत था किंतु कंेवल 40 प्रतिशत भूमि पर उनका अधिकार था। पादरी, कुलीन वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त थे। चर्च, करों का संग्रहण करते थे। पादरी, कुलीन वर्ग को करों से छूट प्राप्त थी।
फ्रांस की जनसंख्या 1789 में 23 मिलियन से बढकर 28 मिलियन हो गई थी। स्पष्ट रुप से देष में भोजन की खपत भी बढ गई। अकाल पडने के कारण अन्न का उत्पादन कम रहा। किसानों को अत्यंत कम मजदूरी पर मजदूर बनने के लिए बाध्य होना पडा। इस प्रकार अन्न की अत्यधिक कमी व अकाल की स्थिति ने भी लोगों को क्रांति के लिए उद्वेलित किया।
18 वी षताब्दी में विभिन्न प्रकार के सामाजिक समूहों का उदय हुआ। मध्यमवर्ग षब्द का प्रचलन ऐसे वर्ग के लिए किया गया जो व्यापार व व्यवसाय के माध्यम से धन अर्जित करते थे। यह वर्ग यूएसए की स्वतंत्रता की उदघोषणा व वहां के नागरिकों को मिले मूलभूत अधिकारों से प्रभावित था। यह षिक्षित वर्ग यह मानता था कि समाज में किसी को भी जन्म के आधार पर कोई विषेषाधिकार नहीं मिलना चाहिए। यह वर्ग विष्वास करता था कि फ्रांस के समाज का आधार स्वतंत्रता, समानता और सभी को समान अवसर प्रदान करने वाला होना चाहिए।
दार्शनिकों की भूमिका
जान लाक ने अपनी पुस्तक टू ट्रीटीज आफ गवर्नमेंट में राजषाही के परम अधिकारों की आलोचना की। जीन जेकस रुसो ने अपनी पुस्तक सोषल कांट्रेक्ट में सरकार की षक्ति को संसद व न्यायपालिका में बांटने की बात प्रस्तावित की।
इन दार्षनिकों के विचार किताबों व समाचार पत्रों के माध्यम से सैलूनों व काफी हाउसों में लोगों के बीच चर्चा का विषय बने। लुई चैदहवें द्वारा अतिरिक्त करो की दर के बढने का समाचार जब प्रकाषित हुआ तब लोगों में षासन व तंत्र के खिलाफ गुस्सा भडक गया।
फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत
लुई चैदहवें द्वारा करो की दर के बढाने के लिए एक इस्टेट जनरल्स की एक मीटिंग बुलाई। इस्टेट जनरल्स एक राजनीतिक तंत्र था जिसमें सभी तीनों इस्टेट के प्रतिनिधि होते थे। प्रथम व द्वितीय इस्टेट के 300 प्रतिनिधि थे जबकि तृतीय यानी जनता व मध्यम वर्ग ने 600 प्रतिनिधि भेजे। तृतीय इस्टेट व्यक्तिगत वोटिंग की मांग कर रही थी जबकि राजा ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। तृतीय इस्टेट वाक आउट कर गया।
20 जून को सभी ने वर्सीलियास के टेनिस कोर्ट के मैदान में एकत्र होकर अपने आप को राष्ट्रीय सभा के रुप में घोषित कर लिया और तब तक सभ को भंग न करने की षपथ ली जब तक संविधान का डाफट तैयार नही हो जाता और राजषाही के अधिकार सीमित नहीं हो जाते। कुलीन वर्ग के मीराबयू एवं पादरी एब्बेसिएस ने तृतीय इस्टेट ज्वाइन कर लिया।
एक ओर राष्ट्रीय सभा संविधान निर्माण में लगी थी तो दूसरी ओर षेष फ्रांस तनाव में था। अराजकता फैल रही थी बेकरी की दुकानों के बाहर लंबी कतारों में घंटों खडे लोगों ने दुकानों को लूट लिया।
ऐसे समय में सम्राट ने सेना की टुकडियों को पेरिस की ओर भेजने का आदेष दिया। पेरिस की जनता ने मिलिषिया बना ली व हथियारों की तलाष में कई इमारतों को ध्वस्त कर दिया।
14 जुलाई को गुस्साई भीड ने बेसिल पर आक्रमण करके उसे तहस नहस कर दिया।
गंावों में यह अफवाह फैल गई कि जमींदारों की सेना चावल की फसल को नष्ट करने के लिए आ रही है। जनता ने जमींदारों के घरों पर आक्रमण करके अनाज लूट लिया और ऋण संबंधी दस्तावेजों को जला दिया। कुलीन वर्ग के बहुत से लोग मारे गए एवं बच रहे लोगों ने दूसरे देषों की ओर प्रस्थान कर दिया।
फ्रांस बना संवैधानिक साम्राज्य
लुई चैदहवें ने अंततः राष्ट्रीय सभा एवं संविधान को मान्यता प्रदान कर दी। 4 अगस्त 1789 रात्रि में सभा ने एडिक्री यानी एक प्रकार का कानून पास करके फयूडल टैक्स, कुलीन वर्गाें व पादरियों के अधिकार , टिथेस एवं चर्च की संपत्तियों को जब्त कर लिया।
राष्ट्रीय सभा ने 1791 में संविधान का मसौदा तैयार कर लिया। इसका मुख्य उददेष्य षाही अधिकारों को सीमित करना था। उक्त सभी अधिकार अलग कर लिए गए एवं इन्हें भिन्न भिन्न संस्थाओं में बांट दिया गया जो संवैधानिक, कार्यकारी एवं न्यायिक संस्थाएं थी। इस तरह से फ्रांस एक संवैधानिक साम्राज्य बन गया। जिसमें कानून बनाने का अधिकार राष्ट्रीय सभा को दिया गया जो एक्टिव सिटीजन्स द्वारा सीधे चुनी जाती थी। एक्टिव सिटीजन्स यानी 25 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिक व तीन दिन की मजदूरी के बराबर कर देने वाले मजदूरों को वोट देने का अधिकार था। इन्होंने एक समूह के लिए वोट किया, इन्हीं समूहों से राष्ट्रीय सभा के सदस्यों का चुनाव हुआ।
संविधान मनुष्य व नागरिकों के अधिकारों से प्रारंभ होता था। जीने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मत रखने की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता जैसे नैसर्गिक अधिकारों को इसमें स्थान दिया गया।
फ्रांस बना रिपब्लिक लुई चैदहवें ने संविधान पर हस्ताक्षर तो कर दिए किंतु गुपचुप रुप से क्रांति को दबाने के लिए प्रूसिया व आस्ट्रिया के राजाओं के साथ समझौता कर लिया। राष्ट्रीय सभा ने मतदान के माध्यम से प्रूसिया व आस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। लोगों ने स्वेच्छा से सेना ज्वाइन की। यह जनता और राजा के बीच सीधा युद्ध था। क्रांति लोगों के लिए हानि र्व आिथर््ाक कठिनाई लाई।
क्लब जेकोबिन्स
1791 के संविधान में राजनैतिक अधिकार केवल संपन्न वर्ग को थे अतः सामान्य वर्ग के लोगों ने राजनीतिक क्लब बना लिए। सबसे सफल क्लब जेकोबिन्स का था। उनका नेता मैक्समिलियन राबेस्पीयर था। क्लब जेकोबिन्स के सदस्य समाज के कम संपन्न वर्ग से थे। उनमें छोटे व्यवसाई, कामगार वर्ग जैसे मोची, बेकर्स, घडीसाज, छपाई करनेवालों के साथ-साथ सेवक तथा दिहाडी मजदूर षामिल थे। जैकाबिन्स लंबी धारियों की पतलून पहनते थे और थीसांस कुलोटस कहलाते थे। जैकाबिन्स ने 1792 की ग्रीष्म में विद्रोह की योजना बनाई। अन्न की कमी और उंचे दामों के कारण पैरिसियन्स क्रोधित थे उन्होंने टयूलेरिस के महल पर धावा बोल दिया। पहरेदारों को मार गिराया एवं राजा को कई घंटे बंधक बनाकर रखा। बाद में एसेम्बिली ने राज परिवार को कैद की सजा सुनाने के लिए मतदान से फैेसला लिया। चुनाव हुए और नवीन निर्वाचित सभा कन्वेंषन कहलाई। 21 सितंबर 1792 को इसने राजषाही व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया एवं फ्रांस को रिपब्लिक घोषित कर दिया।
भय का राज
1793 इसे लेकर 1794 तक का काल रेन आफ टैरर या भय के राज के रुप में जाना जाता है क्योंकि रोबिसपियरे ने नियंत्रण की एवं दण्ड की नीति बनाई। पूर्व का कुलीन वर्ग, पादरी वर्ग, अन्य दलों के नेता एवं यहां तक कि उसकी अपनी पार्टी के नेता जो उससे भिन्न विचार रखते थे, को गिरफतार करके बंदी बनाके गिलोटिन की भेंट चढा दिया। गिलोटिन एक डिवाइस थी जो दो खडे डंडों के बीच धारदार ब्लेड से बनी होती थी जिससे किसी व्यक्ति का सिर काट दिया जाता था। डा गिलोटिन ने इसे बनाया थ इसलिए उनके नाम पर इसे गिलोटिन के नाम से जाना जाता था। रोबिसपियरे की सरकार ने मजदूरी और चीजों की कीमतों पर नियंत्रण किया। मांस तथा ब्रेड की राषनिंग की गई। किसानों पर दबाव था कि वे अनाज षहरों में ले जाएं और षासन द्धारा तय कीमतों पर बेचें। अधिक कीमतों वाला अनाज बाजारों से गायब हो गया था । इसी तरह से समानता की बात सिर्फ भाषणों में ही सुनाई देती थी।। पारंपरिक चर्च बंद कर दिए गए और उनमें कार्यालय या सेना के बैरक खोल दिए गए। अंततः रोबिसपियरे को जुलाई 1794 में गिरफतार करके गिलोटिन पर चढा दिया गया।
डायरेक्टरी शासन
जैकोबिन सरकार के बाद मध्यम वर्ग ने सत्ता हथिया ली। एक नया संविधान बना जिसमें कर न देने वालों को मताधिकार से वंचित रखा गया। दो चुनी हुई विधान परिषद, डायरेक्टरी को अपाइंट करती थी। डायरेक्टरी में 5 सदस्य होते थे। यह व्यवस्था एक सेफगार्ड थी ताकि राबेसपियरे की तरह सत्ता को एक व्यक्ति के अधीन रखने की गलती को दोहराया न जाए। डायरेक्टर्स व विधान परिषद में टकराव की स्थिति बनती रहती थी तब उन्हें डिसमिस कर दिया जाता था। डायरेक्टरी की अस्थिरता ने सैनिक तानाषाह नेपोलियन बोनापार्ट के उदय का रास्ता साफ कर दिया।
फ्रांसीसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका
उस समय के समाज में महिलाओं तक षिक्षा तथा अच्छी नौकरियों की पहुंच नहीं थी। महिलाएं लांड्री, फूल बेचने, फल व सब्जियां बेचने का काम करती थीं या फिर धनी लोगों के घर में घरेलू कार्य के लिए सेविकाओं के रुप में काम करती थी। उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम वेतन प्राप्त होता था। ष्ुारुआती दौर में महिलाओं ने क्रांति में यह सोचकर भाग लिया कि क्रांति में सहभागिता के कारण उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार मिल सकेंगे। किंतु नए संविधान में महिलाओं को मूलभ्ूात अधिकार तो मिलना दूर मत देने का अधिकार भी नहीं मिला। महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए राजनीतिक क्लबों एवं समाचार पत्रों के माध्यम से आवाज उठानी प्रारंभ की। फ्रांस के विभिन्न षहरों में लगभग 60 ऐसे क्लब थे। उनमें द सोसाइटी आफ रिवाल्यूषनरी एंड रिपब्लिकन वुमन क्लब बहुत प्रसिद्ध हुआ। उनकी मुख्य मांग समान राजनैतिक अधिकार, मत देने का अधिकार, एसेम्बली के लिए चुने जाने का अधिकार एवं राजनैतिक कार्यालय खोलने का अधिकार थे। क्रांतिकारी षासन ने ऐसे कानून बनाए जिससे महिलाओं के जीवन में सुधार हो। सभी लडकियों के लिए षिक्षा अनिवार्य कर दी गई। पिता उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका विवाह नहीं करा सकते थे। विवाह एक समझौते के रुप में स्थापित किया गया और इसे सिविल कानून के अंतर्गत मान्यता दी गई। तलाक को वैध बनाते हुए महिलाओं एवं पुरुषों दोनों को आवेदन करने की पात्रता दी गई।
रेन आफ टेरर के समय नई सरकार ने महिलाओं के क्लब बंद करवा दिए एवं उनके राजनैतिक दखल पर रोक लगा दी गई। कई प्रभावी महिला राजनीतिज्ञों को गिरफ्तार कर सजा दे दी गई।
अंततः फ्रांस में 1946 में महिलाओं को मताधिकार मिला।
दास प्रथा का अंत
सत्रहवी षताब्दी में दासों का व्यापार होता था। फ्रांसीसी व्यापारी अफ्रीका के समुद्री किनारों पर पहुंचकर दासों को खरीदते थे। दासों को बांधकर जहाजों में लादकर अटलांटिक से होकर अमरीका के प्लांटेषन मालिकों को बेचा जाता था। यह अफ्रीका अमेरिका व यूरोप के बीच दासों का त्रिकोणीय व्यापार कहा जाता था।
हांलांकि अठारहवी षताब्दी में फ्रांस में दास व्यापार की कुछ आलोचना हुई। नेषनल असेम्बली में लंबी बहस छिडी कि मानव अधिकार सभी फ्रेंच के लिए होने चाहिए चाहे वे उपनिवेष में क्यों न रह रहे हों। किंतु दासों के व्यापारियों द्वारा बडी मात्रा में दिए जा रहे कर की राषि का ध्यान रखते हुए एवं उनके विरोध से डरने के कारण कोई कानून पास नहीं किया गया।
जेकाबिन का षासन का समय एक अच्छे का्रंतिकारी सामाजिक सुधार के लिए जाना जाता है। वह था फ्रांस उपनिवेष में दास प्रथा की समाप्ति। राबेपियरे ने 1794 में एक कन्वेंषन पास किया था जिसके अनुसार फ्रेंच उपनिवेष के सभी दासों को मुक्त कर दिया गया। 10 साल बाद नेपोलियन ने फिर से दास प्रथा को षुरु करवाया। फ्रेंच उपनिवेष से दास प्रथा का खातमा पूरी तरह से 1848 में हुआ।
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