लोकपाल विधेयक

 

  लोकपाल के रूप में आम लोगों को भ्रष्टाचार से लडऩे का एक मजबूत हथियार मिलने वाला है। राज्यसभा में पारित होने के बाद लोकपाल विधेयक १८ दिसंबर को लोकसभा में भी पारित हो गया है। अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह विधेयक कानून के रूप में सामने आ जाएगा।लोकपाल के दायरे में एक मामूली सरकारी कर्मचारी से लेकर प्रधानमंत्री तक को लाया गया है। समाजसेवी अन्ना हजारे और अन्य कई संगठनों के द्वारा छेड़े गए आंदोलन को यह एक बड़ी सफलता मिली है। लेकिन लोकपाल के उद्देश्य को सार्थक करने के लिए इसे पूरे अधिकार देकर मजबूती देनी होगी। इसके साथ अन्य एजेंसियों की तरह इसे सरकार के हाथ की कठपुतली और भ्रष्टाचार करने की एक और एजेंसी बनने से भी रोकने के लिए भी समुचित प्रावधान जरूरी हैं। 

 लोकपाल का ढ़ांचा 
लोकपाल का एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य होंगे। लोकपाल का अध्यक्ष या तो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश या फिर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज या फिर कोई दूसरा महत्वपूर्ण व्यक्ति हो सकता है। लोकपाल में अधिकतम आठ सदस्यों में से आधे न्यायिक पृष्ठभूमि से होंगे। इसके अलावा कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यकों और महिलाओं में से होंगे।  
यह नहीं बन सकेंगे लोकपाल के सदस्य 
- संसद सदस्य या किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा का सदस्य।
- ऐसा व्यक्ति जिसे किसी किस्म के नैतिक भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया हो।
- ऐसा व्यक्ति जिसकी उम्र अध्यक्ष या सदस्य का पद ग्रहण करने तक 45 साल न हुई हो।
- किसी पंचायत या निगम का सदस्य।
- ऐसा व्यक्ति जिसे राज्य या केंद्र सरकार की नौकरी से बर्ख़ास्त किया गया हो या हटाया गया हो।

लोकपाल की चयन समिति

प्रधानमंत्री - अध्यक्ष
लोकसभा के अध्यक्ष - सदस्य
लोकसभा में विपक्ष के नेता - सदस्य
मुख्य न्यायाधीश या उनकी अनुशंसा पर नामित सुप्रीम कोर्ट के एक जज - सदस्य
राष्ट्रपति द्वारा नामित कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति - सदस्य
अध्यक्ष या किसी सदस्य की नियुक्ति इसलिए अवैध नहीं होगी, क्योंकि चयन समिति में कोई पद रिक्त था।

नहीं होगी पुनर्नियुक्ति
 
- लोकपाल कार्यालय में नियुक्ति ख़त्म होने के बाद अध्यक्ष और सदस्यों पर कुछ काम करने के लिए प्रतिबंध लग जाता है।
- इनकी अध्यक्ष या सदस्य के रूप में पुनर्नियुक्ति नहीं हो सकेगी।
- इन्हें कोई कूटनीतिक जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक के रूप में नियुक्ति नहीं हो सकती। इसके अलावा, ऐसी कोई भी जिम्मेदारी या नियुक्ति नहीं मिल सकती, जिसके लिए राष्ट्रपति को अपने हस्ताक्षर और मुहर से वारंट जारी करना पड़े।
पद छोडऩे के पांच साल बाद तक ये राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, संसद के किसी सदन, किसी राज्य विधानसभा या निगम या पंचायत के रूप में चुनाव नहीं लड़ सकते।

लोकपाल का काम और अधिकार क्षेत्र
 
जांच शाखा
- अगर कोई जांच कमेटी मौजूद नहीं है तो भ्रष्टाचार के आरोपी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ शुरुआती जांच के लिए लोकपाल एक जांच शाखा का गठन कर सकता है। इसका नेतृत्व एक निदेशक करेगा।
 
- लोकपाल द्वारा गठित ऐसी जांच शाखा के लिए केन्द्र सरकार अपने मंत्रालय या विभाग से उतने अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध करवाएगी, जितनी प्राथमिक जांच के लिए लोकपाल को ज़रूरत होगी।
 
अभियोजन शाखा
 
- किसी सरकारी कर्मचारी पर लोकपाल की शिकायत की पैरवी के लिए लोकपाल एक अभियोजन शाखा का गठन करेगा। इसका नेतृत्व भी एक निदेशक करेगा।
- लोकपाल द्वारा गठित ऐसी अभियोजन शाखा के लिए केन्द्र सरकार अपने मंत्रालय या विभाग से उतने अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध करवाएगी, जितनी प्राथमिक जांच के लिए ज़रूरत होगी।
 
अधिकार क्षेत्र
लोकसभा द्वारा 27 दिसंबर, 2011 को पारित विधेयक के अनुसार लोकपाल के क्षेत्राधिकार में प्रधानमंत्री, मंत्री, संसद सदस्य और केन्द्र सरकार के समूह ए, बी, सी और डी के अधिकारी और कर्मचारी आएंगे।

लोकपाल के अधिकार
 
तलाशी और जब्तीकरण
- कुछ मामलों में लोकपाल के पास दीवानी अदालत के अधिकार भी होंगे।
- लोकपाल के पास केन्द्र या राज्य सरकार के अधिकारियों की सेवा का इस्तेमाल करने का अधिकार होगा।
 
संपत्ति को अस्थाई तौर पर अटैच करने का अधिकार
- नत्थी की गई संपत्ति की पुष्टि का अधिकार।
- विशेष परिस्थितियों में भ्रष्ट तरीके से कमाई गई संपत्ति, आय, प्राप्तियों या फ़ायदों को ज़ब्त करने का अधिकार।
- भ्रष्टाचार के आरोप वाले सरकारी कर्मचारी के स्थानांतरण या निलंबन की सिफ़ारिश करने का अधिकार।
- शुरुआती जांच के दौरान उपलब्ध रिकॉर्ड को नष्ट होने से बचाने के लिए निर्देश देने का अधिकार।
- अपना प्रतिनिधि नियुक्त करने का अधिकार।
- केन्द्र सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई के लिए उतनी विशेष अदालतों का गठन करना होगा, जितनी लोकपाल बताए।
- विशेष अदालतों को मामला दायर होने के एक साल के अंदर उसकी सुनवाई पूरी करना सुनिश्चित करना होगा।
अगर एक साल के समय में यह सुनवाई पूरी नहीं हो पाती तो विशेष अदालत इसके कारण दर्ज करेगी और सुनवाई तीन महीने में पूरी करनी होगी। यह अवधि तीन-तीन महीने के हिसाब से बढ़ाई जा सकती है।

राज्यों में लोकायुक्त
 
- लोकायुक्त का एक अध्यक्ष होगा। वह राज्य के हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश या फिर हाईकोर्ट का रिटायर जज या फिर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति हो सकता है।
 
- लोकायुक्त में अधिकतम आठ सदस्य हो सकते हैं। इनमें से आधे न्यायिक पृष्ठभूमि से होने चाहिए। इसके अलावा कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यकों और महिलाओं में से होने चाहिए।
लोकायुक्त में नियुक्ति के लिए शर्तें
 
- न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति हो सकती है, अगर वह व्यक्ति हाईकोर्ट के जज हों या रह चुके हों।
 
- न्यायिक सदस्य के अलावा सदस्य बनने के लिए पूरी तरह ईमानदार, भ्रष्टाचार निरोधी नीति, लोक प्रशासन, सतर्कता, बीमा, बैंकिंग, क़ानून और प्रबंधन के मामलों में कम से कम 25 साल का विशेष ज्ञान और विशेषज्ञता हो।
 
कौन नहीं हो सकता
 
- संसद सदस्य या किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा का सदस्य।
- ऐसा व्यक्ति जिसे किसी किस्म के नैतिक भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया हो।
- ऐसा व्यक्ति जिसकी उम्र अध्यक्ष या सदस्य का पद ग्रहण करने तक 45 साल न हुई हो।
- किसी पंचायत या निगम का सदस्य।
- ऐसा व्यक्ति जिसे राज्य या केंद्र सरकार की नौकरी से बर्खाश्त या हटाया गया हो।
- लोकायुक्त कार्यालय में अपने पद के अलावा किसी लाभ या विश्वास के पद पर हो।
- किसी राजनीतिक दल से संबंध हो, व्यापार करता हो, पेशेवर के रूप में सक्रिय हो।
लोकायुक्त की नियुक्ति
 
मुख्यमंत्री - अध्यक्ष
विधानसभा अध्यक्ष - सदस्य
विधानसभा में विपक्ष के नेता - सदस्य
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या उनकी अनुशंसा पर नामित हाईकोर्ट के एक जज - सदस्य
राज्यपाल द्वारा नामित कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति - सदस्य
अध्यक्ष या किसी सदस्य की नियुक्ति इसलिए अवैध नहीं होगी, क्योंकि चयन समिति में कोई पद रिक्त था।

लोकायुक्त की ओर से जांच और अभियोजन
 
- अगर कोई जांच कमेटी मौजूद नहीं है तो भ्रष्टाचार के आरोपी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ शुरुआती जांच के लिए लोकपाल एक जांच शाखा का गठन कर सकता है। इसका नेतृत्व एक निदेशक करेगा।
- एक जांच निदेशक और एक अभियोजन निदेशक होंगे जो राज्य सरकार में अतिरिक्त सचिव से छोटे पद पर नहीं होंगे। उनका चयन अध्यक्ष राज्य सरकार द्वारा सुझाए गए नामों में से करेंगे।
- लोकपाल द्वारा गठित ऐसी जांच शाखा के लिए राज्य सरकार अपने मंत्रालय या विभाग से उतने अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध करवाएगी, जितनी प्राथमिक जांच के लिए लोकपाल को ज़रूरत होगी।
- अभियोजन शाखा के निदेशक लोकायुक्त की शिकायत पर किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा लड़ेगा।
 
क्षेत्राधिकार
 
लोकायुक्त भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर किसी भी मामले की जांच कर सकता है या करवा सकता है, अगर शिकायत या मामला भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ हो। लोकायुक्त निम्न मामलों में जांच कर सकता है:
- ऐसा मामला जिसमें वर्तमान मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हों।
- ऐसा मामला जिसमें राज्य सरकार का वर्तमान या पूर्व मंत्री शामिल हो।
- ऐसा मामला जिसमें राज्य विधानसभा का कोई सदस्य शामिल हो।
- ऐसा मामला जिसमें राज्य सरकार के अधिकारी या कर्मचारी शामिल हों।
- ऐसे सभी कर्मचारी राज्य सरकार के कर्मचारी माने जाएंगे जो ऐसे किसी भी संस्थान, बोर्ड, कॉरपोरेशन, अथॉरिटी, कंपनी, सोसायटी, ट्रस्ट या स्वायत्त संस्था में काम करते हों, जिनका गठन संसद या राज्य सरकार के कानून द्वारा किया गया हो या राज्य सरकार द्वारा आंशिक या पूर्ण रूप से नियंत्रित या वित्तपोषित हों।
- ऐसा व्यक्ति शामिल हो जो ऐसी किसी भी सोसायटी, एसोसिएशन का निदेशक, प्रबंधक, सचिव या कोई और अधिकारी हो जो पूर्ण या आंशिक रूप से राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित या अनुदान प्राप्त हो और जिसकी वार्षिक आय सरकार द्वारा तय की गई सीमा से अधिक हो।
- ऐसा व्यक्ति शामिल हो जो ऐसी किसी भी सोसायटी, एसोसिएशन का निदेशक, प्रबंधक, सचिव या कोई और अधिकारी जिसे जनता से डोनेशन मिलता हो और जिसकी वार्षिक आय राज्य सरकार द्वारा तय की गई सीमा से अधिक हो या या विदेश से प्राप्त होने वाली धनराशि विदेशी चंदा (विनियमन) कानून के तहत 10 लाख रुपए से अधिक हो या फिर केन्द्र सरकार द्वारा तय की गई सीमा से अधिक हो।
 
लोकायुक्त के अधिकार
- लोकायुक्त के पास किसी मामले में जांच एजेंसी के निरीक्षण करने और उसे निर्देश देने का अधिकार है।
- अगर लोकायुक्त को लगता है कि कोई दस्तावेज़ काम का हो सकता है या किसी जांच से संबंधित हो सकता है तो वह किसी भी जांच एजेंसी को आदेश दे सकता है कि वह उस स्थान की तलाशी ले और उस दस्तावेज़ को ज़ब्त कर ले।

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लोकपाल का इतिहास
स्केंडेनेवियाई देशों में स्थापित किए गए ओम्बुड्समैन की तर्ज पर भारत में भी लोकपाल की परिकल्पना की गई है। स्वीडन में ओम्बुड्समैन की स्थापना 1809 में ही की जा चुकी थी। इसके तुरंत बाद कई देशों में अधिकारी वर्ग के रवैये से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए इस तरह की संस्था की स्थापना की गई। भारत में सबसे पहले सन् १९६८ में लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक पेश किया गया था। इसके बाद कई सरकारें आई और गईं लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के चलते ४४ साल में भी लोकपाल विधेयक कानून नहीं बन सका।
पहला प्रयास
मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में पांच जनवरी 1966 को प्रशासकीय सुधार आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने अपनी सिफारिशों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए  द्वि-स्तरीय प्रणाली के गठन की वकालत की। इस द्वि-स्तरीय प्रणाली के तहत केन्द्र में एक लोकपाल (न्यूजीलैंड में संसदीय आयुक्त की तर्ज पर) और राज्यों में लोकायुक्तों की स्थापना पर जोर दिया गया था। इसके बाद सरकार ने पहला लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक 1968 में पेश किया।

कब-कब पेश हुआ लोकपाल
1968 में पहली बार इस विधेयक को चौथी लोकसभा में पेश किया गया। इस सदन से यह विधेयक 1969 में पारित भी हो गया, लेकिन राज्यसभा में अटका रहा। इसी बीच लोकसभा के भंग हो जाने के चलते यह विधेयक पहली बार में ही समाप्त हो गया। इस विधेयक को नए सिरे से 1971, 1977, 1985, 1989, 1996, 1998, 2001, 2005, 2008 में संसद में पेश किया गया, लेकिन हर बार यह किसी न किसी वजय से पारित नहीं हो सका। वर्ष 2011 में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान विवादित लोकपाल बिल को लोकसभा से पारित करा लिया गया, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के चलते राज्यसभा में यह पारित नहीं हो सका। इस वर्ष लोकपाल विधेयक को १३ दिसंबर को राज्यसभा में पेश किया गया। राज्यसभा की मंजूरी के बाद १८ दिसंबर को लोकपाल बिल लोकसभा ने भी पारित कर दिया।


 

Focus Story

आयुष्मान भारत और निरामयम् योजना

 मध्यप्रदेश में 23 सितम्बर से आयुष्मान भारत योजना लागू हो गई है। प्रदेश में यह योजना आयुष्मान मध्यप्रदेश निरामयम् के नाम से लागू की गई है। योजना से प्रदेश के लगभग 1 करोड़ 37 लाख परिवारों को हर साल 5 लाख रूपये का नि:शुल्क कैशलेस स्वास्थ्य सुरक्षा कवच मिल गया है।

लोकपाल विधेयक

राज्यसभा में पारित होने के बाद लोकपाल विधेयक १८ दिसंबर को लोकसभा में भी पारित हो गया है। अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह विधेयक कानून के रूप में सामने आ जाएगा।लोकपाल के दायरे में एक मामूली सरकारी कर्मचारी से लेकर प्रधानमंत्री तक को लाया गया है।

भारत रत्‍न

 भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है भारत रत्न। यह सम्मान राष्ट्रीय सेवा के लिए दिया जाता है। इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है। इस सम्मान की स्थापना 2 जनवरी 1954 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी। 

सीरिया का संकट

सीरिया में आज गृहयुद्ध के हालात हैं जिसे हम सीरियाई संकट भी कह सकते हैं| इसका मुख्य कारण है 1963 से चले आ रहे "बाथ पार्टी" के शासन का अंत करने के लिए पार्टी विरोधियों का विद्रोह| विरोधियों की प्रमुख माँगों में से एक माँग है राष्ट्रपति बशर अल असद का पद से त्याग पत्र, जो कि 1971 से सत्ता में हैं|

फेलिन तूफान

बंगाल की खा़डी में 11 अक्टूबर 2013 को उठे उष्णकटिबंधीय चक्रवात को फेलिन नाम दिया गया है। फेलिन का अर्थ सफायर (नीलम) होता है। ये शब्द थाइलैंड का है। जापान के मौसम विज्ञान विभाग ने 4 अक्टूबर को इसे थाइलैंड की खाड़ी में मॉनिटर करना शुरू किया। इसके बाद पश्चिमी पैसिफिक बेसिन होता हुआ अंडमान सागर पहुंचा।